महान स्वतंत्रता सेनानी संगोल्ली रायण्णा: कित्तूर का अजेय शेर जिसने अंग्रेजों की नींदें उड़ा दी थीं

 


भारत का इतिहास अनगिनत वीर योद्धाओं और उनके बलिदानों की गाथाओं से भरा पड़ा है। जब भी 19वीं सदी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह की बात आती है, तो दक्षिण भारत की एक छोटी सी रियासत 'कित्तूर' का नाम स्वर्णाक्षरों में लिया जाता है। कित्तूर की रानी चेन्नम्मा का नाम तो हम सबने सुना है, लेकिन इस विद्रोह की चिंगारी को शोला बनाने वाले महानायक का नाम था— संगोल्ली रायण्णा (Sangolli Rayanna)

आज के इस लेख में हम जानेंगे कित्तूर के उस अजेय शेर की कहानी, जिसकी गर्जना सुनकर अंग्रेजी हुकूमत भी कांप उठती थी।

जन्म और रानी चेन्नम्मा के प्रति अटूट वफादारी

15 अगस्त 1798 को कर्नाटक के बेलगावी जिले में कुरुबा समुदाय में जन्मे संगोल्ली रायण्णा बचपन से ही युद्ध कला में बेहद निपुण थे। उनके भीतर देशभक्ति कूट-कूट कर भरी थी। उनकी इसी असाधारण वीरता और समर्पण को देखते हुए कित्तूर की महान रानी, चेन्नम्मा ने उन्हें अपनी सेना का प्रमुख (सेनापति) नियुक्त किया था। रायण्णा के लिए रानी चेन्नम्मा सिर्फ एक शासक नहीं, बल्कि एक माँ के समान थीं, और कित्तूर उनकी मातृभूमि।

1824 का कित्तूर युद्ध: अंग्रेजों से सीधी टक्कर

1824 का वह दौर था जब अंग्रेजों ने अपनी कुख्यात 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) के तहत कित्तूर पर कब्जा करने की कोशिश की। रानी चेन्नम्मा ने इसके खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया। सेनापति रायण्णा ने अपनी टुकड़ी के साथ मिलकर अंग्रेजों को रणभूमि में कड़ी टक्कर दी।

हालांकि, संसाधनों की कमी और भारी अंग्रेजी फौज के सामने कित्तूर को हार का सामना करना पड़ा। रानी चेन्नम्मा के साथ-साथ रायण्णा को भी बंदी बना लिया गया। बाद में अंग्रेजों ने रायण्णा को रिहा तो कर दिया, लेकिन उनके सीने में जल रही प्रतिशोध और स्वतंत्रता की आग बुझी नहीं थी।

छापामार युद्ध: अंग्रेजों में खौफ का दूसरा नाम

रानी चेन्नम्मा के निधन के बाद भी रायण्णा ने हार नहीं मानी। उन्होंने आम लोगों, किसानों और जमींदारों को इकट्ठा कर एक गुप्त सेना तैयार की और अंग्रेजों के खिलाफ छापामार (Guerrilla) युद्ध छेड़ दिया।

वे रात के अंधेरे में अचानक ब्रिटिश सरकारी दफ्तरों पर हमला करते, उनका खजाना लूटते और उस धन को गरीबों में बांटकर जंगलों में गायब हो जाते। देखते ही देखते संगोल्ली रायण्णा अंग्रेजों के लिए एक खौफनाक सपना बन गए। ब्रिटिश सरकार उन्हें पकड़ने के लिए पूरी तरह से बौखला गई थी।

अपनों का धोखा और शहादत

इतिहास गवाह है कि कई बार महान योद्धाओं को दुश्मनों की तलवारें नहीं, बल्कि अपनों का धोखा मारता है। जो अंग्रेज संगोल्ली रायण्णा को युद्ध के मैदान में नहीं हरा सके, उन्होंने छल और लालच का सहारा लिया। अपनों के ही विश्वासघात के कारण, अप्रैल 1830 में रायण्णा को सोते समय गिरफ्तार कर लिया गया।

अंग्रेजों ने उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया और अंततः 26 जनवरी 1831 को नंदगढ़ के एक बड़े बरगद के पेड़ से उन्हें फांसी पर लटका दिया।

कहा जाता है कि फांसी के फंदे को चूमते हुए रायण्णा ने आखिरी शब्दों में कहा था— "मैं फिर से इसी धरती पर जन्म लूंगा और तब तक लड़ूंगा, जब तक कित्तूर स्वतंत्र नहीं हो जाता।"

आज भी जीवित है रायण्णा की विरासत

संगोल्ली रायण्णा का शरीर भले ही 1831 में नष्ट हो गया हो, लेकिन उनकी आत्मा और शौर्य गाथा कर्नाटक के लोकगीतों (गीगी पद) में आज भी जीवित है। उनकी स्मृति का सम्मान करते हुए, बेंगलुरु के मुख्य रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर "क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्णा रेलवे स्टेशन" रखा गया है।

संगोल्ली रायण्णा केवल एक योद्धा नहीं थे; वे स्वतंत्रता, साहस और मातृभूमि के प्रति असीम प्रेम के अमर प्रतीक हैं।

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