समाज हित बनाम व्यक्तिगत हठ: पुस्तक बैंक के लिए संपत्ति की जंग, पाल समाज ने कानूनी राह पकड़ी



समाज हित बनाम व्यक्तिगत हठ: पुस्तक बैंक के लिए संपत्ति की जंग, पाल समाज ने कानूनी राह पकड़ी

मुंबई, 12 जुलाई – पाल धनगर गड़रिया समन्वय समिति की मासिक बैठक इस बार बारिश की बाधा पार कर द्वितीय रविवार को संपन्न हुई, लेकिन बैठक में एक ऐसा मुद्दा गरमाया जो समाज के भीतर ‘हम’ और ‘संरक्षक’ के बीच की खाई को उजागर करता है। समाज के विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने के लिए ‘पुस्तक बैंक’ की स्थापना का सपना फिलहाल पाल विकास संघ की ‘टालमटोल नीति’ की भेंट चढ़ता दिख रहा है।

अध्यक्ष ईश्वरदेव पाल की अध्यक्षता और उत्तर प्रदेश से पधारे आचार्य विजयबहादुर पाल की गरिमामयी उपस्थिति में हुई इस बैठक में प्रारंभिक औपचारिकताओं के बाद सीधे समाज की संपत्ति के उपयोग के ज्वलंत प्रश्न पर चर्चा शुरू हुई।

क्या है पूरा मामला?

समन्वय समिति ने जरूरतमंद और मेधावी छात्रों के लिए पुस्तक बैंक शुरू करने की योजना बनाई। इसके लिए पाल सेवा संघ और पाल विकास संघ से उनके संरक्षण में मौजूद समाज की संपत्तियों के उपयोग की अनुमति मांगी गई। जहाँ पाल सेवा संघ ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए अनुमति दे दी (हालाँकि भवन तकनीकी रूप से उपयुक्त नहीं निकला), वहीं दूसरी ओर भायंदर स्थित फ्लैट के लिए पाल विकास संघ से अनुमति मिलना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

‘संरक्षक’ पर ‘मालिक’ बनने का आरोप

समिति का आरोप है कि भायंदर स्थित फ्लैट पुस्तक बैंक के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है, लेकिन पाल विकास संघ के नेतृत्व (विशेषकर राजाराम पाल) लगातार इस निर्णय को लटकाए हुए हैं। शिकायत यह है कि कई बैठकों में आश्वासन देने के बावजूद न तो इस मुद्दे को संघ की आंतरिक समिति में रखा गया और न ही समन्वय समिति को कोई ठोस जवाब दिया गया।

बैठक में गुस्सा और आक्रोश साफ झलका। सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि “समाज की संपत्ति पर अंतिम अधिकार पूरे समाज का है, किसी व्यक्ति या संस्था का नहीं। पाल विकास संघ केवल संरक्षक है, मालिक नहीं।” समाज ने अब इस लड़ाई को सामाजिक और कानूनी स्तर पर ले जाने का मन बना लिया है। अध्यक्ष को हर आवश्यक कानूनी कार्यवाही के लिए पूर्ण अधिकार दे दिए गए हैं।

आचार्य का नैतिक संदेश: हठ छोड़ो, हित देखो

कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण रहे आचार्य विजयबहादुर पाल ने अपने ओजस्वी संबोधन में बिना लाग लपेट के सीधी बात कही। उन्होंने कहा, “समाज की धरोहर समाज को ही समर्पित होनी चाहिए। संरक्षक का कार्य संरक्षण करना है, अधिकार जताना नहीं। किसी को भी नैतिक अधिकार नहीं कि वह समाज को उसकी अपनी संपत्ति के उपयोग से वंचित रखे।” उन्होंने समाज की एकता और राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने पर बल देते हुए सामूहिक हित को सर्वोपरि रखने की सीख दी।


समाज जाग चुका है

यह मामला अब महज एक भवन या पुस्तक बैंक तक सीमित नहीं रहा; यह इस बात की परीक्षा बन गया है कि समाज में निर्णय किसके होंगे—चंद पदाधिकारियों की मनमर्जी से या सामूहिक हित की भावना से? बैठक से यह स्पष्ट संकेत गया है कि समाज अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो चुका है और अब किसी भी स्तर पर समझौता करने को तैयार नहीं है।

अब देखने वाली बात होगी कि क्या पाल विकास संघ इस नैतिक दबाव के आगे झुकता है या फिर समाज की यह लड़ाई अदालत की दहलीज तक पहुँचती है। ब्लॉग पाठकों की राय आमंत्रित है—क्या संरक्षकों को समाज के हित के निर्णयों पर एकतरफा रोक लगाने का अधिकार होना चाहिए?

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