"5000 साल पुराना है धनगरों का इतिहास, जानिए वो सच जो किताबों में नहीं पढ़ाया गया!"

 धनगर समाज का गौरवशाली इतिहास: जब चरवाहों ने संभाली महासाम्राज्यों की कमान

क्या आप जानते हैं कि महाराष्ट्र और भारत की संस्कृति की नींव रखने वाले असल लोग कौन थे? आज इतिहास के पन्नों से धूल हटाकर हम एक ऐसे समाज की बात करेंगे, जिसका अतीत इतना गौरवशाली है कि सुनकर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। यह कहानी है धनगर (गडरिया/पशुपालक) समाज की—जिन्होंने केवल भेड़-बकरियां नहीं चराईं, बल्कि भारत के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों के सिंहासन संभाले।


आइए जानते हैं इतिहासकार संजय सोनवणी और विनयकुमार मदाने-पाटिल के शोध पर आधारित धनगर समाज का वह प्राचीन सच, जिसे शायद जानबूझकर मुख्यधारा के इतिहास में छुपा दिया गया।


1. 3000 ईसा पूर्व की 'सावलदा संस्कृति' और अहिर धनगर


इतिहासकारों के अनुसार, महाराष्ट्र के सबसे पहले मूल निवासी पशुपालक (धनगर) ही थे। तापी नदी की घाटी में 'सावलदा संस्कृति' के अवशेष मिले हैं, जो लगभग 3000 ईसा पूर्व (आज से 5000 साल पहले) पुराने हैं। इस संस्कृति को गढ़ने वाले और कोई नहीं, बल्कि अहिर पशुपालक थे। इसी वजह से उस इलाके की भाषा को आज भी 'अहिराणी' कहा जाता है। पशुपालन, मछली पकड़ना और शुरुआती खेती ही इनका मुख्य जीवन था। यानी आज का धनगर समाज ही इस प्राचीन धरती का असली पूर्वज और वारिस है।


2. पुंड्रपुर (पंढरपुर) और राजा विट्ठल का सच


समय बदला और यह समाज अर्ध-घुमंतू जीवन छोड़कर एक जगह बसने लगा। अहिर धनगरों ने खानदेश पर राज किया, तो पौंड्र धनगरों ने दक्षिण महाराष्ट्र को अपना ठिकाना बनाया। इन्होंने अपनी राजधानी बनाई 'पुंड्रपुर', जिसे आज हम सब पंढरपुर के नाम से जानते हैं। इतिहास के गहरे शोध बताते हैं कि इस समाज के महान आद्य राजा 'विट्ठल' और 'खंडेराय' (खंडोबा) थे। वे अपने समय के इतने पराक्रमी और लोक-प्रिय महापुरुष थे कि आगे चलकर समाज ने उन्हें भगवान का रूप मानकर पूजना शुरू कर दिया। आज पूरा महाराष्ट्र जिन आराध्य देवों के सामने सिर झुकाता है, वे मूल रूप से धनगर समाज के महापुरुष थे।


3. जब मौर्य और सातवाहन साम्राज्यों से जुड़ा नाता


क्या आपको पता है कि चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य भी इसी पशुपालक (मोरी/मौर्य) समाज से निकलकर अखंड भारत के सम्राट बने थे? धनगर समाज का नाता इतने बड़े साम्राज्यों से रहा है।


ईसा पूर्व 230 के आसपास, धनगरों के औंड्र वंश से सादवाहन (सातवाहन) राजवंश का उदय हुआ। सातपुडा पर्वतों के इलाके (खानदेश) से निकलने के कारण इन्हें सातवाहन कहा गया। इनके पहले राजा 'छिमुक' (सिमुख) थे।


मराठी भाषा का स्वर्णकाल: सातवाहन राजाओं को अपनी लोकभाषा 'प्राकृत' से इतना प्यार था कि उनके 450 साल के शासनकाल में एक भी शिलालेख संस्कृत में नहीं मिला। राजा हाल ने इसी प्राकृत भाषा में 'गाथा सप्तशती' जैसा महान ग्रंथ लिखा। इनका समुद्री व्यापार और नौसेना इतनी शक्तिशाली थी कि विदेशी इतिहासकार मेगस्थनीज ने भी अपनी किताबों में इनका लोहा माना था।


4. वाकाटक, राष्ट्रकूट और यादवों का उदय


प्राचीन अर्थशास्त्र में पशुपालक समाज सबसे अमीर और शक्तिशाली वर्ग था। यही कारण था कि सातवाहनों के बाद महाराष्ट्र पर राज करने वाले वाकाटक, कदंब, राष्ट्रकूट, यादव और भोज राजवंश भी इसी विशाल समाज से निकलकर आए। अजंता-एलोरा की विश्वप्रसिद्ध गुफाएं इन्हीं राष्ट्रकूट राजाओं के काल में तराशी गईं, जो आज भी दुनिया को हैरान करती हैं।


हठकर धनगरों का खरात (क्षहरात) राजवंश: सातारा के 'माण' (मानपुर) इलाके से राष्ट्रकूट राजा 'मानांक' का राज था, जिन्हें कुंतलेश्वर कहा जाता था। हठकर धनगरों के खरात, माने, शेंडगे, बंडगर, हाके, मदाने, बर्गे जैसी जातियों का संबंध इसी पराक्रमी योद्धा वर्ग से है, जिन्हें इतिहास में 'मरा-हट्टा' या 'मराठा' भी कहा गया।


धनगर समाज की शाखाएं और उपजातियां (108 कुल और 22 पोट-जातियां)


काम के विभाजन के आधार पर एक ही परिवार के भाइयों से आगे चलकर धनगर समाज भारतभर में साढ़े तीन (3.5) मुख्य विभागों में बंट गया:


1. चरवाहे/योद्धा: हट्टी/हठकर, पाल, कुरुबा, गडरिया आदि।

2. गौपालक (अहिर): यदु और गवली।

3. भैंस पालक: महस्कर/गुर्जर।

4. ऊण-कंबल बुनकर (आधा भाग): खुटेकर, संगर और शेगर।

(कसाई या खटीक समाज को इसका आधा हिस्सा माना जाता है, जिससे यह संख्या साढ़े तीन बनती है, जिसका अपना एक धार्मिक महत्व है।)


आज की हकीकत: हम अपना वैभव क्यों भूल गए?


इतिहास का यह चक्र बड़ा अजीब है। जिस समाज ने 8वीं शताब्दी तक पूरे पश्चिम और दक्षिण भारत को राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से सोने की चिड़िया बनाए रखा; जिसने महाराष्ट्र की लोककला, संगीत और नाटकों को जन्म दिया; जिसके समाज में मल्हारराव होलकर, यशवंतराव होलकर और लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूतियों ने जन्म लिया—वह समाज आज राजनीति का मोहरा बनकर रह गया है।


आज धनगर समाज अपने ही उप-घटकों (अहिर, हठकर, खुटेकर आदि) में बंटा हुआ है, जिसके कारण एकता गायब हो रही है।


चलते-चलते एक कड़वी बात: आपके पूर्वज इस धरती के पहले राजा और निर्माता थे। उन्होंने अदम्य राजसत्ताएं खड़ी कीं और ऐसी वास्तुकला बनाई जिसे देखकर दुनिया आज भी दांतों तले उंगली दबा लेती है। लेकिन आज आपकी इस प्राचीन विरासत और इतिहास पर दूसरों ने कब्जा कर लिया है। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि आप अपनी अस्मिता और अपने गौरवशाली इतिहास को भूल गए।


अब समय आ गया है कि धनगर समाज जागृत हो, अपनी जड़ों को पहचाने, आपसी भेदभाव मिटाकर एक हो और अपने पूर्वजों के उस सुनहरे इतिहास को फिर से दोहराए!


गर्व से कहो, हम उस गौरवशाली इतिहास के वारिस हैं!



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